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" दास्तां "

ईश्वर के धागों से बंधी हृदय की डोर है
मन की उलझनों से परे वो आन्नद की चकोर है
उनके अनुभवों को समझने मे लगे अंतर्मन का शोर है
प्रकृति के सानिध्य से प्राणों में मधुरता की भोर है
सूरज की किरणों को समेटती आंखें रंगों से सराबोर है
पौधों की दयालुता मे लिपटी निर्मलता घनघोर है
समय से परे झांकना किस इंसान का छोर है
अब गंभीरता को जानने का विषय,
भीतर के आंगन की ओर है
हृदय की दास्तां बयां करता यह कलम,
मित्रवत् व्यवहार में विभोर है ।।
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