परिस्थितियों के इम्तेहान में ,
गतिशीलता के दरमियान में ,
अपने हृदय के बागबान में ,
थोड़ा विश्राम चाहते हैं
आन्तरिक पैगाम में,
ईश्वर को तलाशते है
और शांत गहराईयों में , डूब से जाते हैं
पर सांसारिक रस्सियों से ना जाने कैसे खींचे चले आते हैं
घड़ी की सुईयों से जैसे ही आँख मिलाते हैं
बंधनों की कश्मकश में बहते चले जाते हैं
मुस्कराहट बाँटकर जब खुद के पास आते हैं
तो खुद के आंगन में शांत हो जाते हैं
फिर उन ईश्वरीय ख्यालों में खो से जाते हैं
पता नहीं ईश्वर की कैसी परीक्षा हैं
हलचल में खो भी जाते हैं
और एकांत में रो भी जाते हैं।।
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