कोहरा घना है। कहीं दूर जाना है । मेरी नज़रें इस कोहरे को चीरकर अपनी मंज़िल पे टिकी रहना चाहती हैं। अब खुद को कैसे समझाऊं कि थोड़ा रुक जाने में भलाई है। शायद दिल की चाहत भी यही है। पर उस मंज़िल तक पहुंचना है जल्द से जल्द। ये टकराव है। जंग सी है ये। दिल और दिमाग के बीच। इस टकराव का ही नतीजा है कि अब घबराहट सी होने लगी। मीलों चलना है पर इस कोहरे से निपटना कैसे है? शायद कोई बता गया था कि धैर्य रखना होगा। बस अब एक मंत्र जप रहा हूं। इक मंत्र कि मुझे धैर्य रखना है। पर बेचैनी कम नहीं हो रही। ये मंत्र तो रामबाण था। पर कुछ कारगर नहीं लग रहा।
तैयारी तो कुछ नहीं हुई पर काम बहुत कर लिया। मानसिक काम। कदम एक भी नहीं बढ़ाए पर लगातार सोचता रहा कि कैसे पार किया जाए ये रास्ता।
थक हार के ज़रा आराम सा किया। कुछ सुकून मिला।थोड़ा रुकने में ही भलाई है, यही थी दिल की इच्छा। शायद अब पूरी होने का आभास सा हो रहा है। बस ये रोक मुझे मेरे लगातार कुछ ना कुछ सुझाव सोचते रहने पर लगानी थी, मेरे कदमों पे नहीं। अब दिल की इच्छा भी समझ आने लगी।
ज़रा ज्यादा ठहरता तो फिर मेरा दिमाग मेरे कदमों से आगे निकलने लगता। तुरंत उठा,कदम बढ़ाया,दूसरा कदम बढ़ाया, कोहरा छटता चला जा रहा था। कदम बढ़ाता गया कोहरा छटता गया। समय के साथ सब कुछ बेहने लगा। अब मंज़िल देखने की जल्दबाजी नहीं थी। अब कोई बड़ी सी मंज़िल तय करने का जुनून पैदा हो रहा था।
पिछले पड़ाव पे कुछ सीखा। दिल की सुनने में भलाई है।
सोचा इसे अब मंत्र बना लू। पर अब इतनी समझ हो गई है। मंत्र सिर्फ जप्ता ना रह जाऊं मैं दिमाग में ही। अब कोई मंत्र नहीं। हर कदम पे मंत्र बदलेगा। अब ज़रा शांत रहना है। हर कदम पे दिल कुछ बोलेगा। उसे सुनना है।
आगे कहीं मिलूंगा तुमसे। तब बताऊंगा ये मंत्र कि दिल की सुनो हमेशा। बस उस मुलाक़ात के लिए ही बचा रखा है ये मंत्र।
खैर,सफर में मज़ा आ रहा है। अब बस चलते रहना है।
©yash.more
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