गुम सा हूं अपने ही जहान में ll
ठोकरें खाई अब इतनी के दरबदर घूमता हूं शान से ll
मन तो कहता है के फिर मिल जाए हमसफ़र कोई ll
डर फिर डराता है जब बात करता हूं किसी अनजान से ll
पहनावा देखकर और नजरें मिलाकर भी ना समझ पाते हैं ll
उलझे बालों को देख मेरे नया नाम दे जाते हैं ll
खुद ही खुद को बयान किया तो क्या खाक शायर हूं ll
मेरे लिखे अल्फ़ाज़ भी चुनिंदा चेहरों को ही समझ आते है ll
कुछ जानने लगे है मेरी पहचान से ll
पर डर फिर डराता है जब बात करता हूं किसी अनजान से ll
गहराई भी कभी खुद को नापने नहीं देती जब बात उस तक आ जाती है ll
मद्धम हवा भी जब चलती है तो खुद का एहसास करा जाती है ll
आज फिर से बेखबर हैं लोग बीते हर वक़्त की चोट से ll
ना जाने क्यूं मेरे सियाही और कलम बताने चली आ जाती है ll
हो जाए कुछ अनोखा सा अब मांगता हूं भगवान से ll
पर डर फिर डराता है जब बात करता हूं किसी अनजान से ll
penned by Deep Punjabi
©punjabi
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