डर के छुप जाता हूं मैं अपने महफूज ठिकाने में
इस तरह नहीं छोड़ा कोई कसर कोरोना हमें डराने में।
जो बच्चे की तरह अंगुलियां पकड़ कर चलता कभी
क्या कहें सभी हालत गुज़र गए उसे हराने में।
बच्चा समझ कर जो हमने खुली छूट दी लुढ़कने की
अब हम हर एक का सर हैं उसके निशाने में।
लोग तो अणु परमाणु बना कर डर का सौदा कर रहे थे
क्यूं फुंस कर गई शक्तियां कोरोना को भगाने में।
आज़ ये अक्लमंद नस्ल-ए-आदम बेबस खड़ा है
जां बचा जाए शायद दवा दुआ जो थे आदम जमाने में।
हमने अपने तहखाने में भी हरे भरे पोधें उगा रखे है
अनुराग जो काम आते हैं अक्सर इम्यूनिटी बढ़ाने में।
©anuragrahi
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