Y

deepak

आँखो से निकल कर, गालो से फिसलकर,
जब आँसू की ओ बूँद ज़मीन पर गिर रही थी,
तुमसे जुड़ी मेरी सारी उमीदें,
किसी कोने मे तड़प तड़प कर मर रही थी,
ख्वाब तुम्हारा ही उमड़ रहा था,
मेरी राते जितनी दफा करवट बदल रही थी,
मैंने धड़कनो को हर बार रोक कर देखा,
हर लफ्ज मे तुम्हारी बाते चल रहीं थी,
कभी दूरियाँ बढ़ रहीं थी कभी नजदीकिया,
बात धीरे धीरे लगता बिगड़ रहीं थीं,
मेरी दोस्ती और प्यार की बुनियाद शायद इतनी कच्ची ना थीं,
फिर क्यों उम्मीदों की फसले उजड़ रहीं थीं..
©yash.88