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देह का दोष

देह का दोष
है दोष इस देह का,
हर रूप में है कोसता,
नकार दे इसे सभी,
जो इसी के उपभोक्ता।

देह-देह चीखता,
उसी को ये नोचता,
महान इसके आदर्श,
पर कर रहा निचता।

भगवान की बात कर,
दानव का रूप ले,
समाज के ये सारथी,
भीतर से कुरूप है।

मूँद ले ये आँख को,
असभ्य व्यवहार से,
और हाथ इनके बढ़ रहे,
असभ्यता की रीढ़ पे।

सह रही तपन सभी,
हर बात की अंगार पे,
यह देह भी झुलस गई,
ज़ुबान की आग में।

ले रही हो साँस या,
सड़ रही हो कहीं,
हो बंद कही रेशमी,
या खसखस में छिपी।

हर कहीं तलाश है,
यह ज़िंदा नहीं, लाश है,
छोटी इस समाज में,
देह का आलाप है।

युक्ति यह लगा रहे,
कि देह को दबोच ले,
कोई रोक दे इन्हें कभी,
कहे देह का ही दोष है।