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देख कर छांव जुल्फों की मेरा मन तरसे।

देख कर छांव जुल्फों की मेरा मन तरसे
दिल हरषे मगर ये मेरा नयन बरसे।
दिन ढल जाए बस तेरे ही तसव्वुर में
रात भर ये दिल सुकून-ओ-चैन को तरसे।
कोई शिकवा न रहा मुझे जमाने से
हर तरफ़ से इस दिल पे सितम बरसे।
क्यूंकर आए थे आखिर वो होने शामिल
शायद मैयत भी मेरी उनके आने को तरसे।
वो आए तो हुआ ये रूह मुनव्वर
जो जिंदगी भर एक झलक रोशनी को तरसे।
वो घड़ी दो घड़ी हम जहां भी गए अनुराग
उनसे वस्ल के लिए यूंही उम्र भर तरसे।
©anuragrahi