देखीं हमने ,
बड़ी दुनियादारी ,
की बहुत झूठी ,
आन बान की सवारी ,
बन के राख शमशान में ,
मैं बिखर रहा ,
देख ले ,
ऐ दुनिया नादानी ,
था ऐ सिकंदर ही ,
अपने कुल ,
वंश की निशानी ,
पीता भी नहीं था ,
कोई बिना पुछे इससे पानी ,
देख गौरव पताका ,
फहराने निकला था ,
उधार की सांस पर ,
बनता काजी ,
समय का चक्र ऐसे घुमा ,
दरवाजे पर लाश पड़ी ,
उसका सोच रहा ,
काश कोई करें मेरी आगवानी ,
घर में कोहराम मचा है ,
कौन बैठे इस गद्दी पर ,
जिस पर ऐ लाश बैठा ,
कभी सोच रहा था ,
मैं ही हूं एक सिकंदर ,
बाकी सब पुतलों की निशानी ।🤔
धन्यवाद 🙏
____संजय निराला ✍
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