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देखकर जन्नत का ख़्वाब हम रो पड़े।

देखकर जन्नत का ख़्वाब हम रो पड़े
आंगन में आयी नूर-ए-अफताब तो रो पड़े।
जवां हुए ज़रूर मगर कर के याद हम
बचपन की मां की गोद जनाब रो पड़े।
हमने कमाई सोहरत दौलत हर पल हुजूर
मगर चुकाया न मां का हिसाब तो रो पड़े।
हर शाम ये सवाल जेहन में घुमता रहा
न मिल पाया उसका जबाव तो रो पड़े।
राह-ए-इबादत की ओर घर से निकल चले
आयी मां की याद बेहिसाब तो रो पड़े।
अनुराग रोना नसीब हो तो किसी से क्या गिला
सर अपने लिया कोई इल्ज़ाम और रो पड़े।
©anuragrahi