आज़ादी और बर्बादी दोनों साथ आती हैं
जंग-ए-ऐलान भी साथ लाती है...
लहू गिरे तो खिलता है एक फूल
जिस पर जिंदगियां तमाम धाक जमाती हैं...
जात और मजहबों में बटा यह समाज
हँसी आती है जब खुद को एक साथ बताते हैं
यकीन ना हो तो अभी जरा सा भड़कालो
हाथों में तलवारें लिए सभी तमाशा बनाते हैं
कौन कहेगा इन्हें यहाँ आत्मनिर्भर,यहाँ तो सरकार नौकरी नहीं दाल -आटा देने में जुट जाते हैं
कोई पिला दे जरा सा शबाब जो यहाँ
लोग तिनकों के भाओ में बिक जाते हैं
कहाँ जाते हैं सारे वो वादे तमाम
जो कुर्सी मिलने पर जेहन से घिस जाते हैं
अमीरों को कोई फर्क नहीं पड़ता यहाँ साहिब
बस गरीब ही विचारे पिस जाते हैं
कहाँ है वो स्वतंत्र विचार यहाँ
दकियानूसी ही सभी से विचार पातें हैं
आज भी नीच तो नीच ही रहे
कहने को तो सब लोग बराबर के अधिकार पाते हैं
चलिए छोड़िये यह भी एक विवाद हो गया
हमको क्या है किसी से,
हमारा देश तो भई आज़ाद हो गया
हमारा देश तो आज़ाद हो गया....
©deeprichu
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