दिल की किताब खुली तो क्या पढ़ा
तेरा ही नाम हर पन्नों में लिखा पढ़ा।
तेरे बारे में गहराई से जानना चाहा
तुम्हीं कातिल हो तुम्हीं खुदा हो लिखा पढ़ा।
जिस अंदाज से आके रूक गई हो दिल मेंं मेरे
वक़्त भी रूक जाए ऐसे न कभी लिखा पढ़ा।
तेरे जाने में और तेरे आने में जो वक्त लगी
उस पन्नें में भी सदियों का फासला लिखा पढ़ा।
अपनी सूरत भी लगने लगी मुझे परायी सी
तेरे दिल में भी खुद को बसा लिखा पढ़ा।
कभी दुबारा न आया ख्याल-ए-जन्नत मुझको
अनुराग ने जब तेरे घर का पता लिखा पढ़ा।
©anuragrahi
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