दिलदार दिल ने
दिलदार दिल ने दिल से कहा, और ये कविता हो गई,
मेरा हर पल तेरे नाम हुआ, और ये कविता हो गई।
मेरे लबों पे था ज़िक्र तेरा, मेरी आँखों में तेरा नूर था,
तू पास तो था नहीं, मगर मेरी हर सांस में तू जरूर था।
जज़्बात मेरी कलम से निकले, सुकून-ए-दिल बन गए,
लिखा यूँ तेरा नाम फिजाओं पे, और ये कविता हो गई।
आँखों से जो गिरा अश्क मेरा, नग़्मा बनकर बहता गया,
मेरे इश्क़ का अधूरा किस्सा, शायरी बनकर कहता गया।
और जब आखिरी दफ़ा तुझे लिखा, लफ़्ज़ रौशन हो उठे,
उन लफ़्ज़ों से दिल धड़का मेरा, और ये कविता हो गई।
© विशाल सैनी
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