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दिया दिल को तवज्जो हमने वाँ दिल का कोई काम नहीं।

दिया दिल को तवज्जो हमने वाँ दिल का कोई काम नहीं
बज्म-ए-जानाँ से उठ गए हम,याँ दर्द-ए-दिल में आराम नहीं।
वो फेर ली थी मुझसे नजर महफिल में खड़ा था जब सामने
उनके दिल की ये साजिश थी,तन्हा नजर का ये काम नहीं।
गर वास्ता-ए-मुहब्बत नहीं तुझे बुलाई फिर किस वास्ते
तू फिक्र-ओ-दिल पैदा कर,जहां में कौन चिज है इनाम नहीं।
मेरे समझ या मेरे नजर में तो तेरा न अब तक कोई रकिब
क्या हुआ जो हो गई बेवफा कह के,मुझे आपका काम नहीं।
अल्लाह ये तौफिक दे कि तेरे सामने तेरे शहर में रह सकुं
दिदार हो बस रोज़ तेरा,भले मेरे लिए कोई तेरा पैगाम नहीं।
तेरी आसिरी-ए-हुस्न में क्या जरूरत होशों-खिरद का
बिन तोड़े पिंदारे-खुदी अनुराग इरफ़ान-ए-मुहब्बत अंजाम नहीं।

©anuragrahi