दो मीठे बोल में फंसे रहे ,
लेकर अपनी भूख की आंत ,
मिले बहुत काजी यहां ,
गाते रहे व्यथा इनकी ,
लेते रहे सम्मान ,
कहते कहते थके नहीं ,
पर पीड़ा से व्यथित हूँ ,
लिख डाली बहुत किताब ,
पर ढाक के पात सब रहे ,
व्यथित वेदना चाह रही सम्मान ,
रहिमन ने बहुत सुंदर वाणी कहीं ,
पर किसी ने कहां दिया ध्यान ,
मन की व्यथा मन में रखो ,
मत कहो सबसे मेरे यार ,
सुन अठिलैईहें लोग सब ,
और उड़ै है उपहास ,
लिख डालिए बहुत किताब ,
अपनी सम्मान के भूख में यार ,
तुम बन के रह जाओगे कथित ,
फंस के दो मीठे बोल में यार ,
तुम भटकते रह जाओगे ,
ले कर भूखों से उपनाम ,
ऐ खूद भटक रहे ,
अपने सम्मान की भूख लिए ,
पर पीड़ा से व्यथित नहीं ,
ऐ सजा रखें है दुकानों में ,
अपने सम्मान की समान ,
अब तुम्हीं करो विचार ,
पढ़ो इनकी सारी कृति ,
देखो अपना हाल ,
तुम तो बन के रह गए कथित ही ,
ऐ पा गए सारे सम्मान ,
होरि , अबला , कली गुड़िया ,सती हरिजन ,
ना जाने कितने उपनाम ,
समस्या जस की तस रही ,
तुम भी महत्वकाक्षां में भटक गए ,
छोड़ अपने बाहुबल का आस ,
मत बनो कथित ,
कुछ कर लो विचार ,
कड़वा सत्य तो यही है ,
भूख ही भूख यहां ,
बाकी आपके सोच विचार ।🤔
धन्यवाद 🙏
______संजय निराला ✍
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