अजिबो गरिब आज हमने एक मंजर देखा,
पेड़ से गिरा हुआ घायल एक बंदर देखा।
कभी उस टहनियों को रेस का मैदान जो समझा था,
आज उसी मैदान पे उसे फिसलते देखा।
तेरी ये उम्र अभी कहाँ जो मुझसे कसमकस करे,
जमाने में जो मैने देखा तूने अभी कहाँ देखा।
खोखली है ये दुनिया और यहां के लोग,
सब फरेबी है इमानदार खुद सा मैने कहां देखा।
दिवाने है पैसों के खड़े चार-सू में,
जीगर से हो दिवाना किसी का कभी कहाँ देखा।
अब तो बादाकश भी देखें तो शरमा जाए,
मयखाने में शरिफों को जाम पे जाम जो पिते देखा।
यहां अब किसी पर एतवार करें तो करे कैसे,
हर शाम हमने है यहां जोडा बदलते देखा।
अब भी समय है तू संभल जा अनुराग,
हमने निगाहों से है कत्ल करते और कत्ल होते देखा।
©anuragrahi
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