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दोस्ती

दोस्ती

जिस दोस्ती में कभी बात ना हो,

उस दोस्ती में क्या मज़ा?

जो यार कहे पर समझे ना,

बता फिर उस यारी में क्या मज़ा?

जिस सखा से कुछ माँगूँ कभी,

और मिले भी तो हिसाब करके?

जहाँ हर एहसान की गिनती हो,

बता उस ईमानदारी में क्या मज़ा?

वक़्त बदले तो जो रंग बदलें,

और साथ निभाने के वादे हो!

मुश्किल घड़ी में साथ ना हो,

बता ऐसे क़समों-वादों में क्या मज़ा?

जहाँ हँसी बाँटें सब महफ़िल में,

और आँसू छुपाने अकेले हो!

दर्द में जिसकी सिर्फ खामोशी हो,

बता ऐसी हमदर्दी में क्या मज़ा?

पर जो दोस्त मिले और दोस्त ही हो,

और दोस्ती साँसों जैसी हो!

ऐसे मुक्कमल दोस्त के सिवा,

किसी और दिलदारी में क्या मजा?

© विशाल सैनी

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