मैं तेरे जज़्बात की कलम से लिख तो दूं,
मगर कुछ अधूरा सा रह जाता है,
कोई ख्वाब है जैसे,
पूरा ही नहीं होता।
मैं अपने शब्दों की माला से पिरों तो दूं,
मगर तेरे अश्रु के मोती कुछ ज्यादा हैं,
इन्हें संभालना जैसे,
और बिखेरना।
मैं तेरा दर्द जानती तो हूं,
मगर तुझे कैसे कहूं,
तेरी मुस्कान के पीछे का जो गम है,
ये मेरा हमदम है,
मैं वाकिफ हूं इससे जैसे,
ये मेरा है कोई हिस्सा।
©shaaya
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