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दर्द

दर्द की राह में
अपनों की चाह में
भटकती है रहती
कभी आह में कभी निगाह में
कभी पनाह में
जीत के उत्साह में
हार के गम अथाह में
भटकती है रहती
ढूंढती कोई ठिकाना
अपना ना हो जाए बेगाना
बन शमा का परवाना
जलती रहती है
कभी फुर्सत मिले तो सोंचे
क्या चलना हीं है नियति?
क्या भटकना हीं है संस्कृति?
जड हो ग्ए गर
आ जाएगी विकृति?
मगर....
रूकने कहां देती है
तोड देती है...
बिखेर देती है...
सिकुड जाता है इंसा
कूच कर जाता है
फिर भी शूकून कहां
रूह भटकती है रहती..।.
©abhidilse