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दरिया-ए-दिल।

है मुक्कदस ये बात मगर क्यों हैरान हूँ,
जो न सोंचा कभी वही हो गया देखते देखते।
मै खुद से महरूम और बहुत परेशान था,
कब महफूज़ हुई मेरी जिंदगी देखते देखते।
था खुद का सफर कोई कारवां नहीं,
रात कटती गई सहर हो गया देखते देखते।
आज वो ऐसे मिली जैसे कोई अन्जान हो
वो शरमा भी गई मुझे देखते देखते।
वक्त गुजरता गया और पता भी न चला,
मैं बाप हो गया वो माँ हो गई देखते देखते।
इस्तफाकन कभी कहीं गर फिर हम मिले,
हाल पुछो-बताओ नजर से सही देखते देखते।
रूख घर को तेरे मुझे अब इजाजत नहीं,
जिन्दगी की शाम हो गई देखते देखते।
©anuragrahi