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दरम्यां अब कोई दिवार उठाया न करो ।

दरम्यां अब कोई दिवार उठाया न करो
बेवजह दबे शरारे को सुलगाया न करो।
रेत पर लिख कर मिटाती हो मेरा नाम
कभी सामने उतारने गुस्सा आ जाया भी करो।
दिल को कब तक झुठी तसल्ली देती रहोगी तुम
आंख संच बोलती है प्यार छुपाया न करो।
कोई जरूरी नहीं है कि वो शख्स मसिहा ही है
हर किसी को जख्म-ए-दिल दिखाया न करो।
लोग हर बात को अक्सर अफवाह बना देते है
अपने कानों पर इतना भरोसा बरपाया न करो।
शहर-ए-इश्क़ में गम का पथराव बहुत है अनुराग
अपने दिल को शिशे के झरोखे में सजाया न करो।
©anuragrahi