रात्रि के समय हमें कोई एहसास आया..….
हमने अपने कदमों को आगे बढ़ाया....
तो खुद को बादलों के नीचे पाया......
चांद बादलों से झाकंता नजर आया .......
कभी दिखता कभी छिपता अनोखी थी उसकी माया....
बादलों ने खुद को चलायमान कराया ,
और चांद के चेहरे से पर्दा हटाया.......
उसने आंख- मिचौली का खेल वहीं बंद कराया.....
चांद ने मुस्कुराकर अपनी रोशनी को फैलाया ,
और वह दृश्य हमारी आंखों में समाया.....
कहीं दूर से हवा का झोंका आया ,
और उसने हमारे बालों को सहलाया......
हमारे चेहरे को मुस्कुराना आया ,
और हमने भीतर को प्रसन्न कराया.....
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