एसा नहीं की नहीं हो सकती फिर से महोबत पर,
किसी अजनबी को अपना बनाए कौन ?
किसी की जिल सी आंखों को देख उसमें डूबे कौन?
किसी की वो बचकानी भरी प्यारी बाते सुने कौन?
किसी की मुस्कान देख उसमें खो जाए कौन?
किसी को रोता देख आंखों में अश्क लाए कौन?
किसी की खुशी को अपनी खुशी बनाए कौन?
किसी के हर गम को अपना गम बनाए कौन?
किसी की देखने को एक झलक तडपे कौन?
किसी के आगे गिडगिडा कर महोबत जताए कौन?
किसी को महोबत में अपना खुदा बनाए कौन?
उसी खुदा से ठग अपने को काफिर कहेलाए कौन?
©dev_patel
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