अरूणोदय का काल था, किरणों का बिछा जाल था,
मंगलवार के दिन हाथ में लडडूओ का भरा थाली था,
भगवान का पूजन करने सेठानी जी मंदिर जाने लगी,
सेठ जी के पेट में चुहों की सेना शोर मचाने लगी,
सेठ जी गुस्से में चिल्लाएं: पहले होगी पेट पूजा,
पहले खाना खाऊंगा, फिर करूँगा काम दूजा,
सेठानी जी के order पर झटपट मुर्गा दिया काट,
थाली लगाकर table पर सबको दिया गया बांट,
मुख में डालने के लिए सेठ जी उठाई पहली बोटी,
दरवाजे से भिखारी ने आवाज दी: सेठ जी दे दो रोटी,
सेठ जी गुस्से में भुनभुनाने लगे,
गुस्से में दरवाजे की तरफ जाने लगे,
दरवाजे पर देखा, खड़ा था भिखारी भुखा,
काया ऐसे जैसे पीपल का पत्ता सूखा,
देख भिखारी को, सेठ जी को चढ़ गया गुस्सा,
ना आव देखा ना ताव और जमा दिया इक घुसा,
सेठ जी नहीं सुनी भिखारी की कोई बात,
और जमा दी भिखारी के पेट में लात,
भिखारी चुप चाप वहाँ से चला गया,
सेठ जी का गुस्सा भी काफूर हो गया,
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अगले दिन
अरूणोदय का काल था, किरणों ने बिछा दी थी बिसात,
मोहल्ले की कमेटी के सेवक आ गये घर में सात,
बोले, सेठ जी प्रभु की माया देखिए, कल रात यमराज अपना काम कर गया,
नुक्कड़ पर बैठा भिखारी कल रात अंतिम सांस भर गया,
ठंडी से उसका शरीर बन गया है लकड़ी का डंडा,
उसकी अंतिम यात्रा के लिए दे दीजिए कुछ चंदा,
दीजिये आप भी कुछ थोड़ा बहुत पैसा,
ताकि संस्कार हो सके उसका जैसा तैसा,
विनम्र भाव से सेठ जी ने पुकारा सेठानी को,
बोले: रुपये लेकर आना आठ सौ,
सेवक बोले सेठ से-
सेठ जी आप तो बहुत कृपालु है,
सेठ जी आप जैसा ना कोई "दयालु" है,
सारे सेवक सेठ जी की दयालुता के गुण गा रहे थे,
मृत भिखारी को अर्थी पर चढ़ा रहे थे,
भिखारी का हो गया था अंतिम संस्कार,
सेठ जी के गुण गाये जा रहे थे हजार।
विकास गर्ग
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