कभी-कभी टहलते-टहलते यूं ही निकल जाता हूं,
अपने मन के भीतर, सोच की गहराइयों में बहुत दूर...
इतना दूर की संसार की मोह माया से परे,
जहां तक पहुंच पाना सब के बस की बात नहीं।
कोशिश करता हूं इसमें छुपे हुए रहस्यो को टटोलने मे
और भरसक प्रयास करता हूं उनको ढूंढ निकालने मे,
इस खोज में कई-चीजे हाथ लगती है,
उन सबको संजोकर वापस लाने की सोचता हूं।
पर अफसोस,इनकी तहो से बाहर दुनिया मे आते ही
अपने हाथों को खाली पाता हूं और एक बार फिर से अपने आप को इस मायारूपी दुनिया में जकड़ा पाता हूं!!
©abhicool
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