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एक बेरोजगार की जूबानी...

एक बेरोजगार की दिल की बात, कविता के माध्यम से प्रेषित........
हल चलाकर खेतों को मैंने ही बनाया है
गेहूं ,चांवल ,मक्के के दानों को उगाया है
चूल्हा भी बनाया मैंने चांवल को पकाया है
सोऊ यूं भूख पेट मैं,कि मेरे लिए काम नहीं...
मिट्टी की खुदाई की, भट्ठी को जलाया है,
ईंटो को पकाया मैंने बंगला बनाया है
संसद के हर एक खंभा मैंने ही उठाया है
सोऊ यूं फूटपाथ पे, कि मेरे लिए काम नहीं...
साड़ी को बनाया मैंने,मीलों को चलाया है
दाना बाना जोड़ के, कपड़ा बनाया है
सपनों के रंगों से उनको सजाया है
मुझे कफ़न न मिले ,कि मेरे लिए काम नहीं...
रेल को बनाया मैंने, सड़कों बिछाया है
हवा में उड़ाया मैंने चांद से मिलाया है
नांव को बनाया मैंने, पानी पे चलाया है
मेरी न जिंदगी चले,कि‌ मेरे लिए काम नहीं...
शाहजंहा के ताज को मैंने ही बनाया है
मंदिरों को मस्जिदों को मैंने ही सजाया है
बांसुरी,सितार के स्वरो को सजाया है
मेरा संगीत कोई ना, कि मेरे लिए काम नहीं...
सपनें सजाएंगे, जिंदगी बनाएंगे
उंगलियों को मोड़ के, हाथों को उठाएंगे
आसमां को छुएंगे, जिंदाबाद बोलेंगे
लड़ेंगे तब तक रे, कि जब तक काम नहीं....
©renukomre
©REnukomre