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एक ही गुना़ह यह दिल हर बार करता है ।

एक ही गुना़ह यह दिल हर बार करता है
दर्द-ए-दिल का ब्यां बार-बार करता है।
मैं बार बार कहता हूं उल्फ्त-ए-यार भुल जाओ
कभी इकरार करता है कभी इन्कार करता है।
उसने तो बंद कर ली है अपने दिल की गली
जिस बेवफ़ा का ये नादां इंतज़ार करता है।
कोई आए जरा इसे हकीकत समझा दे
बेवजह अक्सर मुझसे इसरार करता है।
काबिल ही नहीं तुम उनके जो वो मुंह फेर लिए
अब ग़म में क्यूँ जिंदगी खुसासार करता है।
सुबह से बिन कुछ खाए पिये ऐसे बैठे हो
क्या ऐसे कोई प्यार का इजहार करता है।
चलो उठो अनुराग अब मयकदे का रूख करें
हम जैसों का एहतराम वहां गमख्वार करता है।
©anuragrahi