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एक ख़त तेरे नाम

आज ये वरक़ तेरे ही
वस्ल की दास्तां कहेगा
कलम की स्याही है,
रंग तो इस दिल का उतरेगा ।
तुम याद नहीं मेरी ,
मेरी किताब का आखिरी शब्द हो
याद का तो याद नहीं हमें ,
इस जिदंगी का आखिरी सार हो।
ख़म का शोक नहीं इन आँखों को,
पर इनायत तेरी आँखों कि है,
जो इक ख़जालत लिये ,
पलके नीचे झुकीं रहती है।
कोई गिला हो हमसे ,
गम़गुस्सार दिल को मत बनाना ,
हमसे गुफ्तगु करना,
गम्माज से रिस्तों का सोदा ना करना।

©priyankave