तुम, चीनी के दानों-सी,ज़िंदगी जैसे दूध का पैकेट,और मैं, चाय की पत्ती।मोहब्बत के सॉसपैन ने हम तीनों को मिलाया।
तुम्हारे आने से ज़िंदगी में मिठास घुल गई, वो ख़ुशगवार हो गई,
पुर-सुकून हो गई, तुम्हारे आने से मेरी अहमियत बढ़ गई।
तुम्हारे बग़ैर मैं अधूरा सा,
तुमने मुझे मुक़म्मल किया। तुम्हारे बिना ज़िंदगी के सारे रंगबदरंग से, फीके से लगते।
वक़्त की धीमी आँच नेइक-दूजे में हमें ऐसे घोला कि हम एक हो गए। तुम, मैं और ज़िंदगी,जैसे चाय होती है ना!मगर उसके बाद पता नहीं क्यूँ मुझे छानकर फेंक दिया गया, तुमसे अलग कर दिया गया,और अब ज़िंदगी में बस तुम ही तुम हो,मैं होकर भी नहीं हूँ।और अब शायद मैं किसी की ज़िंदगी में रंग नहीं भर सकता,ख़ुद अपनी भी नहीं
T