एक मिजाज ही तो साथ अपनी जमाने से रही
कतरा कतरा खूं बह गया जो जिस्म चलाने में रही।
अब रियाज़ कर रहा हूं कि फिर चल फिर सकूं
वगरना बैशाखियों के सहारे उम्र बिताने में रही।
दिन सलिके से उगता है रात ठिकाने से होती है
मगर ये उभरती जख्म मेरी दिल लगाने में रही।
मेरे आंसू किसी घड़ियाल के नहीं तकलुफ के है
न जाने क्यों मेरे जज्बात अबतक समझाने में रही।
हर घर महफूज़ नहीं हर शख्स को घर नहीं
ये मेरी जिंदगी भी मुझे बस आजमाने में रही।
शहर में सब को कहां मिलती है रोने की फुर्सत
मैं हूँ जो मेरी इज्जत हंसने हंसाने में रही।
©anuragrahi
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