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एक रात, एक सपना

एक रात, एक सपना

यही रात अंतिम, यही रात भारी,

बस एक रात की अब कहानी है सारी।

न कोई है साथी, उसका न कोई सहायक,

अकेला है परीक्षा में, परीक्षा का नायक।

जो अब तक पढ़ा है, सिर्फ़ वही काम देगा,

कल का निकलता सूरज भी, उसका इम्तिहान लेगा।

किताबों संग बीती जो रातें, अब रंग लाएँगी,

संघर्ष की राहें उसे मंज़िल तक ले जाएँगी।

न डर सफलता का है, न हार का खौफ़ होगा,

एक सपने की आग में जलता, उसका जोश होगा।

कल जब कलम उसका, उत्तर लिखने को चलेगा,

हर सही जवाब उसके, प्रयासों का प्रमाण बनेगा।

अगर जीत गया तो, वो एक इतिहास लिखेगा,

उसके माँ-बाप का माथा भी गर्व से ऊँचा दिखेगा।

यदि ठोकर भी लगी तो अनुभव की मिसाल बनेगा,

मगर फिर उठकर वही योद्धा वही मैदान चुनेगा।

क्योंकि मेहनत की राहें, कहां व्यर्थ है जाती?

संघर्ष की आग ही, इंसान को, इंसान बनाती।

यही रात अंतिम यही रात भारी........

© रामायण & विशाल सैनी