काश में वो माँ होती
की तेरे डूबने से पहले
तुझसे लिपटती
और उस पानी की शिकायत करती ।
वह मुँह भीचे पड़ा हुआ है
न आह है ना कराह है
चुपी उसके मुंह पर है
अब उसकी आंखों में पानी का सैलाब है
उसके अंदर ना जान है ना पुकार है
कि मिला सकू अब आंखे उससे
कोमल से हाथो से वो चटपटाया होगा
मासूमियत से वो पानी के आगे चिल्लाया भी होगा
बेबसी थी लाचारी थी आज मा की आंखे भी उस निष्ठुर पानी के आगे नम थी
लहरो ने उसके शरीर को पहुचाया तब
जब लड़ रहा था वो अपनी ही सांसो से
अब वो न रहा ना उसकी सांसे रही
काश कोई लौटा दे फिर से उसका जीवन
बचाया गया उसको तब
जब किनारे औंधा पड़ा हुक्का
सुगबुगा रहा था
कोई आकर उसे गुदगुदाए
तो वह फिर जी उठे
काश में वो माँ होती
की तेरे डूबने से पहले
तुझसे लिपटती
और उस पानी की शिकायत करती ।
©anusingh
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