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एक तरफ़

एक तरफ़

तेरे जाने के बाद फिर खुशियाँ भी मुझसे रूठ ही गई,

और तेरे-मेरे नाम पर ज़माने में मचा बवाल एक तरफ़।

मैंने टूटकर भी तुझे कभी बदनाम नहीं किया,

तुझसे मोहब्बत ही क्यों की, दिल का ये सवाल एक तरफ़।

मैं नींद में भी जागता था, ढूँढता तुझे हर तरफ़,

उसके बाद जो मेरा हाल हुआ बदहाल एक तरफ़।

अब किसी ओर से मोहब्बत की हिम्मत कहाँ बची है मुझमें,

दिल ने ही जो दिल के भीतर उठाया भूचाल एक तरफ़।

अगर ये कहानी मेरी कोई और भी लिखता मेरे लिए,

तो जो कम पड़ जाती मिसाल, वो सारी मिसाल एक तरफ़।

© विशाल सैनी

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