एक तरफ जिंदगी की मायने समझा रहे हो
बदले में ये कैसा दिन दिखा जा रहे हो।
नफ़स में मेरे जुनूं की लहू दौड़ा दौड़ा कर
बदन से खूं का एक एक कतरा लिए जा रहे हो।
बना के मेरे लिए अजनबियों से रिश्तों का बंधन
फिर एक बार सबसे तन्हा किए जा रहे हो।
बढा कर मेरे पां अपने मंजिल के तरफ
मंजिल से फिर क्यूँ जुदा किए जा रहे हो।
मैं उस जिंदगी में ही आज से कहीं खुश था
अब खुद से ही मुझे खफ़ा किए जा रहे हो।
©anuragrahi
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