ब्रज के कण कण में तुम बसे हो ।
समय के छण छण में तुम बसे हो ।
बसे हो राधा के नाम मे तुम ,
धरा के कण कण में बसे हो ।
बसे हो ज्ञानियों के ज्ञान में तुम,
मीरा के प्रेम दर्पण में तुम बसे हो ।
बैरागियों के बैराग्य में तुम ,
योगियों के भ्रमण में तुम बसे हो ।
सूरदास के छन्दों में तुम हो ,
तुलसी की रामायण में तुम बसे हो ।
हो चर आ चर में तुम समाए,
वटों के आकर्षक में बसे हो।
चंद्रमा की चाँदनी तुम से ,
सूर्य के प्रकाशन में तुम बसे।
रागिनी की राग तुम हो ,
प्रभात के कारणों में तुम बसे हो।
देवकी माँ की आँचल तुम हो,
यशोदा माँ के , प्रांगण बसे हो,
लोगों के भाग्य में तुम हो, माधव
उनके नेक कर्म , कारणों में बसे हो ।
मेरी तो सांसो तुम ही, मेरे इन प्राणों में बसे हो।
©shivatomar
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