रात के साये में, झरोखों से झाँकना, कब का छोड़ दिया
किसी के साथ अपने ग़मों को बांटना, कब का छोड़ दिया
गर कोई पूछे तो बताते ज़रूर हैं, मगर किसी की हमदर्दी
का आसरा कबका छोड़ दिया।
एक रोज़ उस चाँद को बुला कर, अपने ही दर पर
उसकी कमियों संग उसको भी छोड़ दिया
नहीं परवाह हमें, गर उसको नहीं तो, तभी तो सबकी
परवाह करना छोड़ दिया।
लाख बुरे होंगे किसी के लिए, हमें क्या,जब हमने अच्छाई का रास्ता ही छोड़ दिया।
फ़क़ीर बन कर भी क्या करेंगे? जब खुद ही हाथों की लकीरों को तोड़ दिया।
मोहब्बत, इश्क़, उल्फत, हक़ीक़ी, इबादत क्या है?
सब बंधनों को छोड़ दिया।
फरेब, चालाकी, नफरत, बेईमानी,बेवफाई क्या है?
वही, जिसका नाम हमने खुदी को है दिया।
©deeprichu
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