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गाह-गाह का शिकवा गाह-गाह का प्यार

गाह-गाह का शिकवा गाह-गाह का प्यार
बहुत खुबसूरत थे वो लम्हें मेरे यार।
आपका वो रूठना आप ही से मान जाना
रबाब सी बज जाती थी दिल में बार बार।
पलकों का झपकना होठों की थरथराहट
आगोश में ले लेती थी मेरे सारे अजार।
शर्मिली निगाहों व जन्नत सी बांहों के कफस में
कैद हो जाने को दिल था बेकरार।
आज भी गुंजती है कानों में आपकी सदाएं
आज भी है मुझे उतना ही आपका इंतजार।
©anuragrahi