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गांव की याद।

ताजी ताजी आंखें हो तो अनुराग हर दर्शन अच्छा लगता है,
कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन अब घर अच्छा लगता है।
मैने भी सो कर देखा है नये पुराने शहरों में,
जैसा भी हो अपने घर का बिस्तर अच्छा लगता है।
खाई खुब मशालेदार लिटियां और सिंघाड़े हर गलीयो की,
अब तो सुखा मां का बनाया रोटी अच्छा लगता है।
चमचम करती दफ्तर देखा और बैठा रंगबिरंगी गाड़ीयों में,
विलासिता का रोगी हुं मै मगर अब मां की गोदी अच्छा लगता है।
नये नये खुब दोस्त बने अन्जान नये इन शहरों में,
बस पुराना बचपन का दोस्त लौंगटिया अच्छा लगता है।
रहा बिच बलखाती गोरा बदन सुनहले बालों की परीयों में,
अब होश ठिकाने आ गए बिबि के रोज ताने अच्छा लगता है।
उम्र थका अब पैर थक गए जेहन से भी मैं थक गया हूं,
शायद अभिनय अब पुरी हो गई जो मौत अच्छा लगता है।
©anuragrahi