अब घर 'अपने घर' जैसा नहीं लगता,
वो आवाज़ जो शायद घर जाने की प्रेरणा का काम करती थी
वो भी कहीं गुम है शायद,
या शायद अब कोई बुलाने वाला ही नहीं।
दीवारें जो पहले महफूज़ होने का अहसास कराती थी
अब किसी पिंजरे सा प्रतीत होती ( lagti hai ) है।
हर समय मन एक ऐसा कोना ढूंढ़ता है
जहां किसी की नजर ना पड़ती हो
शायद "वो" आवाज़ भी नहीं सुनना चाहता अब तो ।
हर वक़्त वो शांति ढूंढ़ता रहता है,
वही शांति जो घर से बाहर अगर मिल जाए तो भयावह (haunting) लगती है ।
जिस घर में अब पहले से ज्यादा छूट है
वहां घुटन सा क्यूं लगता है अब
जैसे कोई सजा काटने आया हो।
ये कैसे आज़ादी है जो हर वक़्त
किसी कैद में होने का अहसास कराती है।
जहां शायद पहले से ज्यादा प्यार देने की कोशिश की जा रही है
वो सब छलावा ( pretentious) क्यूं लगता है अब?
जिस अकेलेपन से डरता हूं बाहरी दुनिया में
ढूंढ़ता हूं कोई अपना
यहां अपनों के बीच, पराया क्यूं महशुश करता हूं मैं?
ये कुछ सवाल है जो शायद विरोधाभाषी (contradictory) है,
जिनका जवाब भी घर में ही कैद हो शायद!!!!!
©adarsh_
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