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घुटन

जाने दिल खुश है या अब भी है उदास
जाने आँखों में तुझसे मिलने की है प्यास
या दूर होने का एहसास
कुछ तो छूट सा गया है बहुत दूर
जिसे तलाश रही हूं मैं
या यूं कहूं की उसकी तलाश में
यहां तक आ थमी हूं मैं
कुछ जो अंदर से बहुत ज़्यादा कचोट है रहा
कुछ जो ग्लानि से है भरा
मगर क्या???
अफसोस करूं भी किस किस बात पर???
कुछ भी तो नया नहीं
कुछ तो रह गया जो मिला नहीं
कुछ इल्म सा हुआ तो था मुझे
अपनी बेगुनाही का गुरूर भी कुछ ज़्यादा ही था मुझे
जब कई बार चकनाचूर हुआ
मेरी बेगुनाही का ना कोई सबूत हुआ
फिर भी जैसे कोई टुकड़ा जो है पुकारता
चीख चीख कर अपने वजूद को है निहारता
क्या है जिसे पाने के लिए सब खो दिया
क्या मिला जिसके लिए यूं ही
सब कुछ गवां दिया
वो चीख कुछ धीमी हुई तो
कानो को चीरती हुई कोई आवाज़ गई
जैसे सुबक सुबक कर मेरे ही दिल का कोई हिस्सा
पूछ रहा हो कि तू अब भी तो है वहीं
जहां से चलना शुरू किया
एक रेत का घरौंदा बनाया
और तेज़ हवाओं ने आकर
इन सपनों के महल को निस्तानुबुत किया
फिर कहीं से कोई चीख चली आती है
खटाकर हर चौखट से यही पूछती है
कोई है जिसे सुनाई दे रहा है
कोई है जो मुझे सुन पा रहा है
कोई नहीं है
कोई भी तो नहीं है
होगा भी कैसे
सबको मैंने खुद ही तो है अलग किया
खुद को खुद से ही रुस्वां किया
अब अपनी बेबसी पर खुद ही तरस है आजाता
कमबख्त पागल दिल एक पल को भी तो सुकून नहीं पाता
गुजारिश करूं भी तो किस्से??
जो था है और रहेगा उसे कोई फर्क नहीं पड़ता
मेरी चीखों का उसपर कोई असर नहीं होता
मनोदशा तो देखो
सब कुछ जानकर भी अनजान सी बनी हूं
मैं अपनी बरबादी की तमाशबीन बनी हूं
हंसी जितनी आती है
उससे कहीं ज्यादा आता है क्रोध
एक और ज़रा अजीब सी भावना है
जिसे अवसाद हैं कहते
शायद कोई ओर एक भावना भी है
जिसका नाम नहीं पता
पर है ज़रूर जो अंदर खीझती रहती है
यूं तील तील कर ख़तम होती सांसें
जैसे कुछ गुनगुनाती भी है
बेशक तुझे इल्म नहीं तो ना सही
तेरे मददगारों में हम शामिल भी नहीं
पर हर सांस ने
बस तेरे लिए ही है दुआएं मांगी
अपने रब से सदा तेरी सलामती की सदाएं मांगी
काश अब अपनी मंज़िल को तू जल्दी पा जाए
इस बार मेरी दुआ जल्दी
कबूल हो जाए
सच मान मुझसे ज़्यादा तेरे लिए
कोई खुश नहीं होगा
दावा है मेरा अपनी तबाही का
किसी ने भी इतनी बेसब्री से
इंतजार नहीं किया होगा।।
©anvisha