कभी पछुआ तो कभी पूर्वा, हवा चलती है,
मेरे घर से भी एक दुआ चलती है।
मैं कितना भी दूर क्यों न चला जाउं,
मेरे माँ के आशिषों की कारवां चलती है।
वहम-ओ-भरम में न पड़ मेरे सितमगर,
साया बनकर मेरे साथ बखुदा चलती है।
शिकस्त तो आज़माइश में होती है कभी कभी,
काँटों पत्थड़ों पर भी ये दिल जवां चलती है।
तब की हवा कुछ और थी अब की हवा कुछ और है,
फिजा में अब साथ साथ गर्द-ए-मरज चलती है।
इस तबदीली से मै भी अछूता नहीं रहा,
मैं तनहा नहीं अब साथ साथ मेरे दवा भी चलती है।
©anuragrahi
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