V

गज़ल

थक कर ये बदन,दर्द से, बहुत चूर अभी है।
उलझाओ नहीं, मंजिल ,बहुत दूर अभी है।।
दरिया का रुख,किधर है,परवाह अब किसे,
तूफान है,तो जोश भी, भरपूर अभी है।
महलों के कंगूरो पर, उम्र भर वो रहा,पर,
इक झोपड़ी की,आस में, मजदूर अभी है।
आंसू वहीं गिराया, जहां घाव दिया था,
जख्मों पे नमक छिड़कने का,दस्तूर अभी है।
झुक जायेगी कमर,तो लहज़ा भी झुकेगा,
अभी जिस्म में है ताकत,मगरूर अभी है।
तन्हाइयों में याद आयेंगे,पुराने दोस्त,
उगता हुआ सूरज है, मशहूर अभी है।
मिलते ही आंसुओं से, सराबोर कर दिया,
सच ही कहा था उसने,कि वो मजबूर अभी है।
-विजय वर्मा
17-04-2020
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