सोचता हूँ कि मैं सोचता नहीं.
फिर क्यों सताता है फिक्र बूढापे कि, जबानी में.
सब का घर नहीं बसता है अमरेन्द्र.
टुट जाता है इक दुसरे कि मनमानी में.
झूठा दिखावा क्यों करते हो.
गर तुम साथ न हो परेशानी में.
निभानी तो पडेगी यहाँ
जो नियति ने लिखी है कहानी में.
बहुत मुश्किल से मिलती है ये जिंदगी.
क्यों बर्बाद करते हो इसे खिचातानी में.
©amrendraku
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