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ग़ज़ल

ख्वाबों को तोड नींद से उठ कर तलाश कर
जो हाथ मे नही वो मुकद्दर तलाश कर
जिन हाथों ने मारा है वो हाथ तोड उसी से
तू छोड अपने ज़ख्म को पत्थर तलाश कर
मंजिल की आरजू़ है तो रस्ते निकाल खुद ही
इस दौर के न हरगिज़ रहबर तलाश कर
उस को तो हुक्म था कि ग़रकाब करदे तुझको
दरिय का क्या कसूर तू सागर तलाश कर
सईद सागर
©9421824999