रंजिशे गम मिटाने की वो अब शाम आ ग्ई
खुद को खुद से मिलाने की बरहम आ ग्ई
कितनी शिद्दत से सजाया था मैंने अपने चमन को
गुलों के खिले रहने की कैसे मुद्दते तमाम आ ग्ई
छोड कर बैठा हूँ मैं अब दुनियां की सारी रवायतें
एक मुस्कुराहट की आहट में सुबह से शाम आ ग्ई
इस कदर गिरफ्तार था उनके प्यार में दीवाना बना
उसने नजरें क्या फेरी मेरी जिंदगी बदनाम हो ग्ई
जा जा ओ दिलरूबा सदा खुश रहना अपनी दुनियां में
और क्या दूँ उसको सजा जो किस्सा तमाम कर ग्ई
©abhidilse
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