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गम-ए-इश्क़ में आंखों को भिंगा देती है ये आंसू।

गम-ए-इश्क़ में आंखों को भिंगा देती है ये आंसू
दर्द-ए-दिल को पल भर के लिए मिटा देतीं है ये आंसू।
वैसे खुशहाली में तो इसका किरदार नहीं कोई
मिले गर खुशी अकाएक तो रूला देतीं है ये आंसू।
होंठों की हंशी व चेहरे के खुशी से रूह ब्यां नहीं होता
छुपाए लाख फिर मगर छलक आती है ये आंसू।
दिल नहीं कोई सोख्ता कि सोख ले समन्दर को
दिल भर जाए तो निकल आती हैं ये आंसू।
आंसूऐं फकत दुख की अमानत हैं मैं नहीं मानता
रुखसती वक्त बेटी के,खुशी में लोग सजा लेते हैं ये आंसू।
अनुराग जिक्र करके आंसूओं का कुछ दिल हल्का हुआ
न जाने क्यों तेरे आंखों से बेवजह टपक आती है ये आंसू।

©anuragrahi