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ग़म-ए-जिंदगी की छुपाने लगें हैं।

ग़म-ए-जिंदगी की छुपाने लगें हैं
तुझे देख कर हम मुस्कुराने लगे हैं।
गिला क्या करें कोई शिकायत नहीं है
तेरे दर्द दिल में अब बसाने लगें है।
मेरे वफाओं के बदले में दगा तू न देना
जमाने भी मुझको आजमाने लगे हैं।
तुझे पाने की ख्वाहिश मुद्दतों की थी
औरों की न हो जाए डर ये सताने लगें हैं।
गिरा क्या दो बुंद फलक से जमीं पे
अरमां अब कई दिल में पालने लगे हैं।
कई बार मैंने सामने रखकर आईना
तेरी शक्ल उसमें निहारने लगें हैं।
©anuragrahi