गम के समन्दर में मेरी कश्ती मझधार रहे,
दिल की रहनुमाई से हम बर्बाद रहे।
आज हम सब के साथ खुब हंसें,
और फिर देर तक उदास रहे।
जिंदगी सब को इक दिन रोना सिखा देगी,
क्यों न उसके करीब आस-पास रहे।
उससे तो है अपना सदियों पुराना वास्ता,
आंखें मुंद कर अब हमारा विश्वास रहे।
मुफलिसी में ही पली बड़ी ये जिन्दगी,
रिश्ता अटुट मुफलिसी में भी आबाद रहे।
सपनों में हम खुब चांद तारों के साथ खेले,
आंखें खुली तो गरिब दोस्तों के ही साथ रहे।
कम से कम खुदा मुझे इतना रईस न बनाना,
कि हिरे और मोती का मुझे पहचान न रहे।
अनुराग भी केवल इन्सान ही है भगवान् नहीं,
इलतजा सलामत इतनी मै और मेरा खानदान रहे।
©anuragrahi
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