ग़म का सेहरा पहना है दोनों आंखों की खुशी देकर
चला भी जाऊंगा मगर औरों को जिंदगी देकर।
मुकर्रर की है मेरी मौत खुदा ने फिर क्यों ये
मारने पर तुले हैं जालिम नए नए ज़हर देकर।
मुश्किल है महफूज इज्ज़त आबरू रख पाना
गई तो वापस न आएगी जान भी देकर।
तमन्ना कौन करता है जिंदगी तमाशाबीन बनी रहे
आंखें दिल से झुठ बोलतीं है मौत का मंजर देखकर।
रिश्ता-ए-दिल न उठ जाएं कहीं इस दुनियां से
उसने बहुत है चोट पहुंचाई इल्जाम-ए-दुशमनी देकर।
थोड़ा खुदा से डरो कुछ तो आकबत के लिए छोड़ दो
कह गए हैं अनुराग को बुजुर्ग दुआ-ए-सलामती देकर।
©anuragrahi
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