काहे पूजे कान्हा पर्वत,
पूछे प्रश्न हर ग्वाला है,
छोड इंद्र की पूजा काहे,
यह विधान कर डाला है,
कहे कृष्ण हे ! ब्रज वालों,
यह पर्वत नही संरक्षक है,
करता पालन सब जन का,
हम ग्वालों का यह रक्षक है,
इसकी छाया में रहकर,
हमको मिलता सब सुख है,
यह नाथ है जग के ग्वालों,
हरते सबके कष्ट दुख है,
रूप हरि का मानो इनको,
इनमे उनकी छाया है,
पूजे जो गोवर्धन को,
मिट जाए सारी माया है।
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©vikasgarg
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